(तस्वीरों के साथ) ... सुमन रे ... नयी दिल्ली, चार अगस्त राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय जूडोका अस्मिता डे ने कहा कि उन्हें शुरू से पूरा भरोसा था कि वह देश के लिए इतिहास रचेंगी और यही अटूट आत्मविश्वास उनकी सबसे बड़ी ताकत साबित हुआ। अस्मिता ने मंगलवार को केंद्रीय खेल मंत्री मनसुख मांडविया के आवास पर आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के पदक विजेताओं के सम्मान समारोह के दौरान ‘पीटीआई’ से कहा, ‘‘ग्लास्गो रवाना होने से पहले मेरे मन में सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि मुझे स्वर्ण पदक जीतना है। मैं खुद से लगातार कहती रही कि मैं स्वर्ण पदक के साथ भारत लौटूंगी।’’ अपने सफल अभियान पर अस्मिता ने कहा कि फाइनल मुकाबले में एक समय ऐसा भी आया जब उन्हें लगा कि स्वर्ण पदक हाथ से निकल सकता है, लेकिन कोच यशपाल सोलंकी के उत्साहवर्धन ने उनका आत्मविश्वास लौटाया। उन्होंने कहा, ‘‘फाइनल में मेरा मुकाबला कनाडा की खिलाड़ी से था। वह रैंकिंग में मुझ से थोड़ी नीचे है इसलिए मुकाबला बेहद कड़ा था। जब उसने मेरे खिलाफ अंक हासिल किया तो कुछ क्षण के लिए लगा कि शायद मैं हार जाऊंगी।’’ अस्मिता ने बताया, ‘‘ मेरे कोच यशपाल सोलंकी लगातार कहते रहे कि यह स्वर्ण पदक हमारा है और मुझे हर हाल में जीतना है। उनके शब्दों से मेरा आत्मविश्वास बढ़ा। मैंने अधिक आक्रामक खेल दिखाया, स्कोर बराबर किया और मुकाबला ‘गोल्डन स्कोर’ तक पहुंच गया। वहां मैंने पहला अंक हासिल कर स्वर्ण पदक अपने नाम कर लिया।’’ अपनी सफलता के सबसे बड़े कारण पर अस्मिता ने कहा कि जूडो जैसे तकनीकी खेल में शारीरिक क्षमता से अधिक मानसिक मजबूती निर्णायक भूमिका निभाती है। उन्होंने कहा, ‘‘हम सभी खिलाड़ी लगभग एक जैसी ट्रेनिंग करते हैं। मेरे भार वर्ग में भारत की कई खिलाड़ी समान स्तर का अभ्यास करती हैं। असली अंतर मानसिकता का होता है। प्रतियोगिता के दबाव को कौन बेहतर ढंग से संभालता है, किसमें अधिक आत्मविश्वास और खुद पर भरोसा होता है, यही सफलता तय करता है। शारीरिक रूप से दूसरे खिलाड़ी भी मेरे जितने मजबूत हो सकते हैं, लेकिन अंततः मजबूत मानसिकता ही जीत दिलाती है।
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