General
12h ago हिंदी
सफाई पर निगमायुक्त का सख्त फरमान: 25 हजार का जुर्माना, फिर भी बड़ा सवाल कार्रवाई कितनी होगी!
जबलपुर. शहर को साफ रखने के लिए आदेश जारी करना आसान है, लेकिन आदेश का असर जमीन पर दिखाई दे, यही असली कसौटी है. जबलपुर नगर निगम ने सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी मिलने पर सफाई व्यवस्था संभालने वाली चारों एजेंसियों पर प्रतिदिन 25-25 हजार रुपये का जुर्माना लगाने की सख्त चेतावनी दी है. निगमायुक्त राम प्रकाश अहिरवार ने अधिकारियों, कर्मचारियों और सफाई मित्रों से शहर को अपना घर समझकर काम करने की अपील भी की है. आदेश में सख्ती है, भाषा में अपनापन है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार जुर्माने का डर वास्तव में सफाई व्यवस्था में बदलाव ला पाएगा या यह भी उन आदेशों की कतार में शामिल हो जाएगा, जिनका असर कागज से आगे नहीं बढ़ पाता. निगमायुक्त ने स्वास्थ्य विभाग की समीक्षा और शहर के निरीक्षण के दौरान यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक स्थानों पर गंदगी किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी. सफाई में लापरवाही मिलने पर संबंधित सफाई एजेंसी पर रोजाना 25 हजार रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा. चार एजेंसियों के स्तर पर यह राशि एक दिन में एक लाख रुपये तक पहुंच सकती है. कागज पर यह कार्रवाई निश्चित रूप से सख्त दिखाई देती है, लेकिन स्वच्छता व्यवस्था का अनुभव बताता है कि केवल जुर्माने की घोषणा से व्यवस्था नहीं बदलती. असली प्रभाव तब होगा जब निरीक्षण नियमित हो, गंदगी की जिम्मेदारी तय हो, जुर्माना वास्तव में वसूला जाए और बार-बार लापरवाही करने वाली एजेंसी के खिलाफ अनुबंध की शर्तों के तहत आगे की कार्रवाई भी हो. यही वह बिंदु है जहां निगमायुक्त की पहल को केवल प्रशासनिक आदेश के बजाय जवाबदेही की व्यवस्था में बदलने की जरूरत है. यदि किसी क्षेत्र में सुबह सफाई के बाद कुछ ही घंटे में सड़क, बाजार, नाला या सार्वजनिक स्थान फिर कचरे से भर जाता है तो सवाल केवल सफाई कर्मचारी पर नहीं, पूरी व्यवस्था पर उठता है. कचरा उठाने का समय क्या है, वाहन नियमित पहुंच रहे हैं या नहीं, कचरा कहां ले जाया जा रहा है, निगरानी कौन कर रहा है और शिकायत के बाद कितनी देर में समाधान होता है, इन सभी सवालों के जवाब भी उसी व्यवस्था का हिस्सा हैं. निगमायुक्त का यह कहना कि कर्मचारी शहर को अपना घर समझकर काम करें, अपने भीतर एक महत्वपूर्ण मानवीय संदेश रखता है. सफाई केवल नौकरी का काम नहीं है. जिस सड़क पर कर्मचारी काम करता है, उसी शहर में उसका परिवार भी रहता है. जिस बाजार को वह साफ करता है, उसी शहर की हवा में वह सांस लेता है. इसलिए कर्तव्यबोध और अपनेपन की भावना निश्चित रूप से स्वच्छता को मजबूत कर सकती है. लेकिन इस भावना को प्रशासनिक जवाबदेही का विकल्प नहीं बनाया जा सकता. व्यवस्था में संवेदनशीलता जरूरी है, मगर उसके साथ निगरानी और कार्रवाई भी उतनी ही जरूरी है. जुर्माने को लेकर भी यही सावधानी जरूरी है. यदि सफाई एजेंसी को पता हो कि 25 हजार रुपये का जुर्माना केवल निरीक्षण के दौरान कागज पर दर्ज होगा और उसकी वसूली नियमित रूप से नहीं होगी, तो इसका निवारक प्रभाव खत्म हो जाता है. इसके विपरीत यदि प्रत्येक जुर्माने का रिकॉर्ड सार्वजनिक हो, संबंधित एजेंसी से राशि की वास्तविक वसूली हो और लगातार खराब प्रदर्शन पर भुगतान में कटौती या अनुबंध संबंधी कार्रवाई की जाए, तो वही 25 हजार रुपये का जुर्माना प्रभावी प्रशासनिक औजार बन सकता है. इसलिए अब निगम के सामने चुनौती केवल जुर्माना लगाने की नहीं, बल्कि जुर्माने को परिणाम से जोड़ने की है. हर जोन में निरीक्षण की स्पष्ट व्यवस्था, समय-स्थान के साथ गंदगी की तस्वीर, संबंधित एजेंसी की पहचान, कार्रवाई का रिकॉर्ड और जुर्माने की वसूली की स्थिति दर्ज की जा सकती है. इससे सफाई व्यवस्था में जवाबदेही तय करने के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि किस क्षेत्र में कौन-सी एजेंसी लगातार कमजोर प्रदर्शन कर रही है. निगमायुक्त ने हर जोन में एक वार्ड को आदर्श वार्ड के रूप में विकसित करने की योजना भी सामने रखी है. यह प्रयोग तभी सार्थक होगा जब आदर्श वार्ड केवल रंग-रोगन, सड़क किनारे सफाई और कुछ सौंदर्यीकरण तक सीमित न रहे. उसे ऐसी व्यवस्था का मॉडल बनाना होगा जहां घर से कचरा संग्रहण, सार्वजनिक सफाई, कचरा परिवहन, नालियों की सफाई, कचरे के वैज्ञानिक निपटान और नागरिकों की शिकायतों के समाधान तक पूरी श्रृंखला व्यवस्थित हो. यदि एक वार्ड में यह व्यवस्था सफल होती है तो दूसरे वार्डों में उसे दोहराना भी आसान होगा. जबलपुर जैसे तेजी से बढ़ते शहर में स्वच्छता को केवल कर्मचारियों की संख्या से नहीं मापा जा सकता. शहर जितना बढ़ता है, कचरे की मात्रा और सार्वजनिक स्थानों पर दबाव भी उतना ही बढ़ता है. बाजारों, मुख्य सड़कों, आवासीय क्षेत्रों और व्यावसायिक इलाकों की जरूरतें अलग-अलग हैं. ऐसे में एक ही तरीके से पूरे शहर को साफ रखने की कोशिश पर्याप्त नहीं होगी. स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार निगरानी और संसाधनों का इस्तेमाल जरूरी है. यहां नागरिकों की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है. सार्वजनिक स्थान पर कचरा फेंकना और फिर नगर निगम को दोष देना आसान है. स्वच्छता व्यवस्था तभी टिकाऊ होगी जब नागरिक भी कचरा निर्धारित स्थान पर डालें, घर से निकलने वाले कचरे को अलग-अलग रखें और खुले में कचरा फेंकने से बचें. लेकिन नागरिकों से अनुशासन की अपेक्षा करने के साथ निगम को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि निर्धारित व्यवस्था वास्तव में उपलब्ध और नियमित हो. निगमायुक्त की सख्ती का सबसे सकारात्मक पहलू यह है कि उन्होंने स्वच्छता को केवल विभागीय काम मानने के बजाय अधिकारियों, कर्मचारियों और सफाई मित्रों के कर्तव्यबोध से जोड़ा है. मगर अब इस संदेश को प्रशासनिक परिणाम में बदलना होगा. शहर को अपना घर समझने की अपील तभी असरदार होगी जब नगर निगम भी शहर की प्रत्येक सड़क, गली, बाजार और सार्वजनिक स्थल को अपनी जिम्मेदारी समझे. 25 हजार रुपये का जुर्माना अपने आप में समाधान नहीं है. यह तभी असरदार होगा जब उसके पीछे लगातार निरीक्षण, निश्चित जिम्मेदारी, पारदर्शी रिकॉर्ड और वास्तविक वसूली खड़ी हो. अन्यथा जुर्माने की रकम बढ़ती रहेगी और गंदगी भी बनी रहेगी. इस बार नागरिकों की नजर केवल इस बात पर नहीं होगी कि निगम ने कितना सख्त आदेश दिया, बल्कि इस पर होगी कि आदेश के बाद कितने स्थान साफ हुए, कितनी एजेंसियों पर वास्तविक कार्रवाई हुई और कितनी राशि वसूली गई. आखिर स्वच्छ शहर आदेशों से नहीं, आदेशों के दिखाई देने वाले परिणामों से बनता है. निगमायुक्त ने सख्ती का रास्ता चुना है और साथ ही कर्मचारियों में अपनापन जगाने की कोशिश की है. अब स्वास्थ्य विभाग और सफाई एजेंसियों की जिम्मेदारी है कि इस सख्ती को औपचारिकता न बनने दें. क्योंकि शहरवासियों को जुर्माने की घोषणा नहीं, अपने आसपास साफ सड़क, साफ नाली, साफ बाजार और कचरा-मुक्त सार्वजनिक स्थान चाहिए. यही किसी भी स्वच्छता अभियान की वास्तविक सफलता का पैमाना होगा.