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12h ago हिंदी
बड़वानी में विस्थापितों ने 6 घंटे तक NVDA कार्यालय घेरा:अंबेडकर चौक से रैली निकाली; अधूरे पुनर्वास पर प्रदर्शन, टीनशेड और मुआवजे के मुद्दे उठाए
सरदार सरोवर परियोजना के विस्थापितों ने गुरुवार को भीमराव अंबेडकर स्मारक चौक से रैली निकाली। दोपहर 12:30 बजे से शाम 6:30 बजे तक NVDA कार्यालय का घेराव कर उन्होंने पुनर्वास के लंबित काम पूरे करने और पात्र परिवारों को अधिकार देने की मांग की। पुनर्वास नीति और अदालत के फैसलों का पालन नहीं होने का आरोप विस्थापितों का आरोप है कि नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले, पुनर्वास नीति और अदालतों के आदेशों के बावजूद वर्षों से पुनर्वास का काम अधूरा है। उनका कहना है कि पुनर्वास किए बिना लोगों को डूबग्रस्त करना कानून और नीति का उल्लंघन है। उन्होंने इसे आदिवासी और दलित परिवारों के साथ अत्याचार बताया। विस्थापितों ने टीनशेड के मामले में अंतिम जवाब नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि इस मामले में सिर्फ शुरुआती जांच रिपोर्ट दी गई है। वर्ष 2019 में शासन के प्रभारी दल और पुलिस ने लोगों को डूबते घरों से निकालकर बड़वानी जिले के चार टीनशेड में रखा था। जांच के बाद भी इन परिवारों की पात्रता मंजूर करने और पुनर्वास का अधिकार देने की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। सर्वे में मकानों को डूब से बाहर बताने पर सवाल विस्थापितों के मुताबिक, ग्राम पिछोडी में 27 अक्टूबर को हुए सर्वे में कुछ परिवारों के मकान डूब से बाहर बताए गए, जबकि उनके मकान डूब चुके हैं। उन्होंने सर्वे में लेवल की गड़बड़ी का दावा किया। छोटा बड़दा मूलगांव में 31 अक्टूबर को सर्वे करने पहुंचे दल ने 40 मकानों को डूब से बाहर बताया था। विस्थापितों का कहना है कि ये मकान रास्ते से प्रभावित हो रहे हैं। केवट, ठीकर, कुम्हार और छोटा बड़दा के नट-कोली मोहल्ले के मामलों में भू-अर्जन एवं पुनर्वास कार्यालय को प्रस्ताव भी दिया गया है। 2019 में डूबग्रस्त हुए परिवारों को पात्र मानने की मांग विस्थापितों ने बताया कि 21 और 22 अक्टूबर को बड़वानी के अनुविभागीय और पुनर्वास अधिकारी, NVDA के अधिकारियों, तहसीलदार और सैकड़ों विस्थापितों के बीच सत्याग्रह के दौरान चर्चा हुई थी। उनके मुताबिक, चर्चा में तय हुआ था कि वर्ष 2017 की सूची में नाम होना पात्रता का एकमात्र आधार नहीं होगा। वर्ष 2019 में डूबग्रस्त हुए सभी पात्र परिवारों को शामिल किया जाएगा। टीनशेड में लाते समय बनाए गए पंचनामों और सूचियों को भी आधार माना जाएगा। इसके अलावा जिनके मकानों का भू-अर्जन हुआ है, उन्हें पुनर्वास का अधिकार देने और जिन लोगों को भूखंड आवंटित हो चुके हैं, उनकी पात्रता मंजूर मानने पर सहमति बनी थी। विस्थापितों ने बड़वानी जिले के 1992 और 1499, यानी कुल 3491 परिवारों से जुड़े भूखंड के मुद्दे पर भी सवाल उठाया। उनकी मांग है कि बड़ा भूखंड लौटाने पर छोटा प्लॉट देने और प्रधानमंत्री आवास योजना की राशि लेने वाले परिवारों को 5.80 लाख में से 1.20 लाख घटाकर 4.60 लाख रुपए दिए जाएं। 60 लाख के अनुदान और GRA में अध्यक्ष पद रिक्त होने का मुद्दा विस्थापितों ने कहा कि 60 लाख रुपए के अनुदान की पात्रता मंजूर होने या GRA के आदेश के बावजूद 2 हेक्टेयर जमीन के बदले अनुदान नहीं पाने वाले सैकड़ों परिवारों को न्याय नहीं मिल रहा है। उन्होंने भीलखेड़ा के कैलाश अवास्या और बिजासन के राजाराम श्याणा के मामले उदाहरण के तौर पर रखे। उनका कहना है कि GRA में अध्यक्ष पद रिक्त होने के कारण 60 लाख रुपए का भुगतान नहीं हो पा रहा है। विस्थापितों ने बताया कि NVDA ने GRA को सिफारिश भेजकर दो सदस्य नियुक्त किए हैं। ऐसे में इन सदस्यों के माध्यम से भुगतान कराने की मांग की गई। विस्थापितों ने सुप्रीम कोर्ट के अप्रैल 2026 के आदेश का हवाला देते हुए महिला, संयुक्त और नाबालिग खातेदारों को भी पुनर्वास अनुदान का लाभ देने की मांग की। उनका कहना है कि जब कोई स्टे ऑर्डर नहीं है तो आदेश का पालन नहीं रोका जाना चाहिए। दूसरे गांवों के पुनर्वास के मुद्दे भी उठाए प्रदर्शन के दौरान कई अन्य गांवों के मामलों पर भी चर्चा हुई। इनमें राजघाट के 11 दुकानदारों को कसरावद रोड पर विवादमुक्त जमीन में भूखंड आवंटित करने की मांग शामिल रही। कुकरा और राजघाट के 22 परिवारों को गुजरात में मिली खारी-बंजर जमीन की जांच, छोटा बड़दा में असामाजिक इकाई के 84 परिवारों की सूची, खेड़ी पुनर्वसाहट, सौंदूल वसाहट में भूखंड परिवर्तन और धार के 23 परिवारों को आवंटित जमीन पर कब्जा नहीं मिलने का मुद्दा भी उठाया गया। इसके अलावा खाऱ्या भादल के GRA में 2010-11 से लंबित मामलों और धनोरा, पिपरी, अमलाली, बिजासन व जांगरवा के विस्थापितों की समस्याओं पर भी चर्चा हुई। बैकवाटर लेवल और पुनर्वास स्थलों की सुविधाओं पर सवाल विस्थापितों ने बैकवाटर लेवल के पुनरीक्षण से 15,946 परिवारों को गलत तरीके से डूब से बाहर घोषित करने का आरोप लगाया। उन्होंने रजिस्ट्रीकरण में धारा 158 और 165-7-बी के तहत 10 साल तक जमीन हस्तांतरण पर रोक का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि भू-अर्जन एवं पुनर्वास कार्यालय में 90 से ज्यादा पदों के मुकाबले केवल 6 कर्मचारी तैनात हैं। पुनर्वसाहट स्थलों पर पानी, रास्ते और बिजली की कमी के साथ बजट और भ्रष्टाचार की जांच की मांग भी की गई। विस्थापितों ने मांग की कि सभी लंबित मुद्दों पर कानून और न्यायालयों के फैसलों के आधार पर समयबद्ध निर्णय लिए जाएं। साथ ही राज्य स्तर से अधिकारों का विकेंद्रीकरण कर प्रक्रिया तेज की जाए।