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12h ago हिंदी
UP Elections 2027: गोरखपुर सदर में 60 साल से क्यों कायम है भगवा दबदबा? योगी के गढ़ में बीजेपी को हराना विपक्ष के लिए क्यों मुश्किल
Gorakhpur Urban Assembly Seat: उत्तर प्रदेश की सियासत में कुछ विधानसभा सीटें सिर्फ चुनावी आंकड़ों की वजह से अहम नहीं होतीं, बल्कि उनके पीछे दशकों की राजनीतिक विरासत, संगठन और स्थानीय समीकरण काम करते हैं. गोरखपुर सदर ऐसी ही सीट है, जहां चुनावी मुकाबला अक्सर सिर्फ उम्मीदवारों के बीच नहीं, बल्कि गोरखनाथ मठ के प्रभाव और उसकी राजनीतिक विरासत के बीच भी देखा जाता है. 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ एक बार फिर सवाल उठ रहा है कि आखिर योगी आदित्यनाथ के इस गढ़ में बीजेपी का दबदबा इतना मजबूत कैसे बना हुआ है. गोरखनाथ मठ से जुड़ी सियासी विरासत गोरखपुर सदर की राजनीति को समझने के लिए गोरखनाथ मठ की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. महंत दिग्विजय नाथ से लेकर महंत अवैद्यनाथ और फिर योगी आदित्यनाथ तक मठ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की राजनीति में अपनी अलग पहचान बनाई. मठ की सामाजिक पहुंच ने अलग-अलग समुदायों के लोगों के बीच संपर्क का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया. यही नेटवर्क समय के साथ चुनावी राजनीति में बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण आधार बनता गया. योगी का ग्रासरूट नेटवर्क बना ताकत योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक दौर में हिंदू युवा वाहिनी ने भी पूर्वांचल में एक व्यापक जमीनी नेटवर्क तैयार किया. 2002 में स्थापित इस संगठन ने स्थानीय स्तर पर सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों को लेकर सक्रियता दिखाई. 2017 में योगी के सीएम बनने के बाद संगठन की सक्रिय राजनीतिक भूमिका समाप्त हो गई, लेकिन सालों में तैयार हुआ जमीनी संपर्क गोरखपुर की राजनीति पर अपनी छाप छोड़ चुका था. पूर्वांचल की राजनीति में जातीय समीकरण बेहद अहम माने जाते हैं, लेकिन गोरखपुर सदर का चुनावी पैटर्न कई बार इससे अलग दिखाई देता है. शहरी क्षेत्र होने के कारण यहां व्यापारी वर्ग के साथ ब्राह्मण, ठाकुर, कायस्थ और वैश्य समुदायों को भी महत्वपूर्ण मौजूदगी है. यही वजह है कि विपक्ष के लिए पारंपरिक मुस्लिम-यादव समीकरण या व्यापक गैर-यादव OBC रणनीति को इस सीट पर सीधे जीत में बदलना आसान नहीं माना जाता. विकास भी बना राजनीतिक मुद्दा 2017 के बाद गोरखपुर में कई बड़े विकास प्रोजेक्ट सामने आए. AIIMS, गोरखपुर फर्टिलाइजर प्लांट का पुनरुद्वार, सड़क और हाईवे विस्तार समेत कई इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं ने शहर की तस्वीर बदलने में भूमिका निभाई. बीजेपी समर्थक इसे योगी सरकार के विकास मॉडल से जोड़ते हैं. यही विकास की कहानी 2027 में पार्टी के लिए वोट मांगने का एक प्रमुख आधार बन सकती है. गोरखपुर को बीजेपी का मजबूत किला माना जाता है, लेकिन साल 2018 के लोकसभा उपचुनाव ने इस धारणा को कुछ समय के लिए चुनौती दी थी. सपा उम्मीदवार प्रवीण निषाद ने बीजेपी के उपेंद्र दत्त शुक्ला को हराया था. हालांकि, यह लोकसभा उपचुनाव था और इसके बाद 2022 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह अलग नजर आई. 2022 में योगी ने दर्ज की बड़ी जीत 2022 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ खुद गोरखपुर सदर से मैदान में उतरे. उन्होंने SP की सुभावती शुक्ला को 1,03,390 वोटों के बड़े अंतर से हराया और 66 फीसदी से अधिक वोट हासिल किए. अब नजर 2027 पर है. विपक्ष के सामने एंटी-इनकंबेंसी, जातीय समीकरण और स्थानीय मुद्दों को चुनावी रणनीति में बदलने की चुनौती होगी. वहीं बीजेपी के पास मठ की विरासत, संगठन, व्यापारी वर्ग का समर्थन, विकास कार्य और सबसे बढ़कर योगी आदित्यनाथ का व्यक्तिगत कनेक्शन है. यही वजह है कि यूपी चुनाव 2027 में गोरखपुर सदर सिर्फ एक विधानसभा सीट नहीं, बल्कि योगी आदित्यनाथ की राजनीतिक पकड़ और बीजेपी के पूर्वांचल मॉडल की बड़ी परीक्षा के तौर पर देखी जा रही है.