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12h ago हिंदी
सीए बनने का सपना छोड़ बाड़मेर की रुचिका बनीं साध्वी:बोलीं- सपने में आई दादी ने दी अनुमति; लाडनूं में सात मुमुक्षुओं ने दीक्षा लीं
बाड़मेर की रुचिका मालू ने रविवार को सांसारिक जीवन त्यागकर संयम का मार्ग अपना लिया। उन्होंने डीडवाना-कुचामन जिले के लाडनूं में सुबह करीब 11 बजे आचार्यश्री महाश्रमणजी के हाथों से दीक्षा ग्रहण की। समारोह में आचार्यश्री ने नामकरण संस्कार के तहत मुमुक्षु रुचिका को साध्वी धर्मार्थप्रभाजी का नाम दिया। एमए तक पढ़ाई कर चुकी रुचिका बचपन से ही धार्मिक और आध्यात्मिक संस्कारों से जुड़ी रही हैं। रुचिका ने बताया कि पहले उनका टारगेट सीए बनने का था, लेकिन अब वह चारित्र अंगीकार कर संयममय जीवन की शुरुआत कर चुकी हैं। बता दें कि दीक्षा समारोह में कुल सात मुमुक्षुओं ने दीक्षा ली, जिनमें एक मुनि, पांच साध्वियां और एक समणी शामिल हैं। इस दौरान मुमुक्षु बाबूलाल बाफना को मुनि हितकुमारजी, मुमुक्षु सुमन नाहटा को साध्वी सुपार्श्वप्रभाजी, मुमुक्षु सुमन बैद को साध्वी ओमप्रभाजी, मुमुक्षु अर्चना मेहता को साध्वी अर्चनाप्रभाजी, मुमुक्षु कोमल को साध्वी कोमलप्रभाजी और मुमुक्षु भावना को समणी भक्तिप्रज्ञाजी नाम प्रदान किया। दादा-पापा रोज मंदिर ले जाते थे, मां सामायिक नहीं करने पर डांटती थीं रुचिका ने बताया कि उन्हें धर्म के संस्कार परिवार से ही मिले। बचपन में सामायिक नहीं करने पर मां डांटती थीं और सामायिक पूरी होने तक कमरे से बाहर नहीं निकलने देती थीं। दादा मेवाराम मालू और पिता रुपेश मालू उन्हें रोज मंदिर लेकर जाते थे। परिवार में बचपन से ही यह सीख दी गई कि जीवन में चाहे कोई भी काम करें, धर्म से जुड़े रहना जरूरी है। दादा और पिता की इच्छा थी कि परिवार से कोई दीक्षित बने। हालांकि मां और दादी इसके लिए तैयार नहीं थीं। बाद में मां राजी हो गईं, लेकिन दादी, पोती के दीक्षा लेने के पक्ष में नहीं थीं। दादी से अनुमति मांगने में लगता था डर रुचिका ने बताया कि जब भी दादी से दीक्षा की अनुमति मांगने की बात होती, उनकी तबीयत खराब हो जाती थी। उन्हें डर लगता था कि कहीं दादी को कुछ न हो जाए, इसलिए उन्होंने उनके सामने दीक्षा की बात करना ही छोड़ दिया। जुलाई 2021 में दादी का निधन हो गया। रुचिका ने बताया कि निधन के कुछ दिन बाद उन्हें सपना आया, जिसमें दादी ने दीक्षा की अनुमति दी। इसके बाद परिवार की सहमति से उन्होंने संयम जीवन अपनाने का निर्णय लिया। सीए बनने का सपना था, अब बोलीं- चारित्र अंगीकार भी सीए रुचिका ने कॉलेज तक पढ़ाई की और चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का ड्रीम था। हालांकि उनके मन में शुरू से ही सांसारिक मोह-माया और दिखावे से दूर रहकर एक दिन दीक्षा लेने का संकल्प था। अब वह कहती हैं कि सीए का एक अर्थ ‘चारित्र अंगीकार’ भी है। दीक्षा लेकर उन्होंने अपने इसी संकल्प को पूरा किया है। 2015 में गर्ल्स कॉलेज छात्रसंघ की उपाध्यक्ष बनीं रुचिका साल 2015 में गर्ल्स कॉलेज के छात्रसंघ चुनाव में जीत दर्ज कर उपाध्यक्ष बनी थी। चुनाव में उनकी प्रतिद्वंद्वी उनकी दोस्त थीं। दोस्त के चुनाव हारने पर उन्हें काफी दुख हुआ था। रुचिका का कहना है कि वह जीवन में किसी को दुख नहीं देना चाहतीं। 5 साल लाडनूं में रहकर आध्यात्मिक ज्ञान लिया रुचिका ने करीब 5 साल लाडनूं स्थित परमार्थिक शिक्षण संस्थान में रहकर धार्मिक और आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित किया। गुरु की निश्रा में रहते हुए उन्हें तप, तपस्याओं और विहार का मौका मिला। इसके बाद रविवार को आचार्यश्री महाश्रमणजी से दीक्षा लेकर उन्होंने पूर्ण रूप से संयम जीवन में प्रवेश किया। रुचिका चार बहनों में सबसे बड़ी हैं। उनके पिता रुपेश मालू व्यापारी हैं, जबकि मां लीला देवी गृहिणी हैं। परिवार में दादा मेवाराम मालू सहित अन्य परिजन भी हैं। रुचिका का संदेश- संस्कारों को कभी न भूलें दीक्षा से पहले रुचिका ने कहा कि जीवन में संस्कारों का होना बेहद जरूरी है। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने संस्कारों को कभी नहीं भूलना चाहिए और हमेशा धर्म से जुड़े रहना चाहिए।