उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश एन वी अंजारिया ने रविवार को कहा कि पारिवारिक विवादों में अदालतों के जरिए निकाले गए समाधान अक्सर कृत्रिम हो जाते हैं और मामले से जुड़े पक्षों को लगता है कि फैसला उन पर थोपा गया है। उन्होंने कहा कि ऐसा न्याय ‘‘भ्रम जैसा’’ होता है और अन्याय का रूप ले लेता है। न्यायमूर्ति अंजारिया ने कहा कि पारिवारिक समस्याओं के समाधान के लिए मध्यस्थता सबसे उपयुक्त वैकल्पिक विवाद समाधान (एडीआर) व्यवस्था है, क्योंकि ये विवाद मानवीय भावनाओं और संवेदनशीलता से जुड़े होते हैं। वह यहां ‘पारिवारिक विवादों में एडीआर बनाम न्यायिक फैसला : चुनौतियां और आगे का रास्ता’ विषय पर आयोजित पूर्वी क्षेत्रीय सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि परिवारिक विवादों की बढ़ती संख्या चिंता का विषय है। हाल के वैवाहिक विवादों के रुझान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि पति-पत्नी के बीच एक विवाद कई मुकदमों का कारण बन सकता है। उन्होंने कहा कि न्याय हासिल करने के लिए हर उपलब्ध कानूनी उपाय का इस्तेमाल करके मुकदमों की संख्या बढ़ाना सही नहीं है। न्यायमूर्ति अंजारिया ने कहा कि कुटुंब न्यायालय अधिनियम का उद्देश्य पारिवारिक विवादों का समाधान करना था और इसमें समझौते तथा सामाजिक रूप से उचित परिणाम हासिल करने पर जोर दिया गया था। उन्होंने कहा कि कुटुंब अदालत के न्यायाधीश को समझौता कराने वाले, मध्यस्थ और विवाद समाधानकर्ता की कई भूमिकाएं निभानी होती हैं, लेकिन यह कानून अपने उद्देश्य को पूरी तरह हासिल नहीं कर पाया है। उन्होंने कहा कि एडीआर में पारिवारिक विवादों को सुलझाने के लिए मध्यस्थता सबसे उपयुक्त व्यवस्था है। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता में मानवीय मनोविज्ञान को समझते हुए समाधान तलाशा जाता है और दोनों पक्षों के लिए लाभकारी स्थिति उत्पन्न होती है।
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