भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था में यूपीआई केवल भुगतान का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि वह रोजमर्रा के आर्थिक व्यवहार का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। सब्जी वाले से लेकर बड़े कारोबारी तक, टैक्सी से लेकर ऑनलाइन खरीदारी तक और घरेलू लेन-देन से लेकर व्यावसायिक भुगतान तक-यूपीआई ने पैसे के लेन-देन की आदत, गति और भाषा तीनों बदल दी हैं। ऐसे में यूपीआई से जुड़े शुल्क की व्यवस्था केवल बैंकिंग या फिनटेक कंपनियों का कारोबारी विषय नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध उपभोक्ता की आदत, छोटे व्यापार की लागत और भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की दिशा से है। यहां एक तथ्यात्मक स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है। सितंबर 2026 में सरकार ने जो नया ढांचा स्पष्ट किया है, उसके अनुसार व्यक्ति से व्यक्ति यानी पी2पी को यूपीआई भुगतान किसी भी राशि पर निःशुल्क रहेगा। रू.2,000 तक के व्यापारी भुगतान पर भी एमडीआर नहीं है। रू.2,000 से अधिक के कुछ पी2एम यानी ग्राहक से व्यापारी भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर का प्रावधान किया गया है और रू.75,000 या उससे अधिक के लेन-देन पर प्रति लेन-देन अधिकतम रू. 300 की सीमा रखी गई है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह शुल्क ग्राहक से सीधे वसूल किया जाने वाला लेन-देन शुल्क नहीं है, बल्कि व्यापारी-पक्ष का एमडीआर है। The post यूपीआई शुल्कः सुविधाओं का विस्तार या उपभोक्ता पर बोझ? first appeared on AVK NEWS SERVICES .
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