बेंगलुरु में आयोजित होने वाले ‘बिहार महोत्सव-2026’ में शामिल होने के लिए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी बेंगलुरु पहुंचे। एयरपोर्ट पर बड़ी संख्या में मौजूद बिहारवासियों ने दोनों नेताओं का स्वागत किया। बेंगलुरु पहुंचने के बाद मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष संजय सरावगी गौशाला पहुंचे। वहां उन्होंने गौ सेवा की और गायों को फल खिलाए। इस दौरान उन्होंने गौशाला में मौजूद लोगों से भी मुलाकात की। ‘बिहार महोत्सव-2026’ के शुभारंभ कार्यक्रम में हुए शामिल इसके बाद बेंगलुरु में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ‘बिहार महोत्सव-2026’ कार्यक्रम में शामिल हुए। इस दौरान संजय सरावगी ने कहा कि मुख्यमंत्री की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित होने वाला यह महोत्सव बिहार की समृद्ध लोक परंपराओं, कला, संस्कृति और सांस्कृतिक विरासत को व्यापक मंच पर प्रस्तुत करने का महत्वपूर्ण अवसर है। इस महोत्सव के माध्यम से बिहार की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नई मजबूती मिलेगी और देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले लोगों को बिहार की गौरवशाली विरासत को करीब से जानने का अवसर प्राप्त होगा। मुख्यमंत्री ने बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा, 31 दिसंबर 2028 तक राज्य में मां सीता का भव्य मंदिर स्थापित किया जाएगा। उन्होंने बिहार की विकास यात्रा, बढ़ते बजट, सिंचाई क्षमता और एआई आधारित सुशासन व्यवस्था का जिक्र करते हुए कहा कि जनता को संतुष्ट रखना, उसकी सुविधा बढ़ाना और उसे न्याय दिलाना ही लोकतांत्रिक शासन का मूल उद्देश्य है। श्री श्री रविशंकर ने बिहार महोत्सव की सराहना करते हुए इसे राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का माध्यम बताया। उन्होंने कहा, महोत्सव में बिहार की विविध संस्कृति, मधुबनी कला और पारंपरिक व्यंजनों के माध्यम से देश की विविधता और लोगों के बीच आपसी जुड़ाव को प्रदर्शित किया गया है। मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम के दौरान बिहार के व्यंजन और मधुबनी पेंटिंग्स सहित विभिन्न स्टॉलों का भी अवलोकन किया। प्रवासी बिहारियों को अपनी जड़ों से जोड़ने का सशक्त माध्यम संजय सरावगी ने कहा कि यह महोत्सव केवल सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि प्रवासी बिहारियों को अपनी जड़ों, अपनी माटी और अपनी संस्कृति से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम भी है। देश के विभिन्न राज्यों में रहने वाले बिहारियों के लिए ऐसे आयोजन अपनी सांस्कृतिक पहचान और परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करते हैं। विशेष रूप से नई पीढ़ी को बिहार की लोक संस्कृति, विरासत और परंपराओं से परिचित कराने में ऐसे कार्यक्रम महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
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