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6d ago हिंदी
नशा मुक्ति काशी के लिए पदयात्रा:शास्त्रीय जनजागरण अभियान का शुभारंभ, BHU के प्रोफेसर बोले- भ्रामक मान्यताओं पर होगा शोध
नशामुक्त काशी के संकल्प को लेकर रविवार को कचहरी स्थित सर्किट हाउस से शास्त्री घाट तक एक जनजागरण पदयात्रा निकाली गई। पदयात्रा का नेतृत्व आईएमए के प्रो. सुनील कुमार ने किया, जबकि इसमें सारनाथ से आए वैदिक बटुकों सहित विभिन्न सामाजिक, धार्मिक और शैक्षणिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यात्रा के दौरान लोगों को नशे के दुष्प्रभावों से अवगत कराते हुए स्वस्थ, संयमित और जागरूक समाज के निर्माण का संदेश दिया गया। पदयात्रा के समापन पर आयोजित सभा में वक्ताओं ने काशी में प्रचलित कुछ धार्मिक मान्यताओं और सामाजिक परंपराओं की शास्त्रीय समीक्षा पर आधारित जनजागरण अभियान शुरू करने की घोषणा की। अभियान का उद्देश्य किसी संप्रदाय, परंपरा अथवा व्यक्ति विशेष का विरोध नहीं, बल्कि वेद, उपनिषद, स्मृति, पुराण, आगम तथा अन्य प्रामाणिक सनातन ग्रंथों के आलोक में प्रचलित मान्यताओं का अध्ययन कर समाज के समक्ष प्रमाण-आधारित तथ्य प्रस्तुत करना बताया गया। नशाखोरी बनी देश के लिए गंभीर चुनौती प्रोफेसर सुनील कुमार ने कहा - वर्तमान समय में नशाखोरी, धूम्रपान, शराब और अन्य मादक पदार्थों का बढ़ता सेवन समाज के लिए गंभीर चुनौती बन चुका है। उनका कहना था कि यदि किसी प्रकार के नशे को धार्मिक स्वीकृति या आध्यात्मिक महत्व से जोड़कर प्रस्तुत किया जाता है, तो उसके विरुद्ध जनजागरण और भी कठिन हो जाता है। इसलिए धार्मिक विषयों पर शास्त्रीय प्रमाणों के आधार पर समाज में स्वस्थ संवाद आवश्यक है। अभियान से जुड़े शोधकर्ताओं ने बताया कि प्रथम चरण में चार प्रमुख विषयों पर शास्त्रीय अध्ययन प्रस्तुत किया जाएगा। इनमें भगवान विश्वनाथ (महादेव) को विष अथवा नशे के पदार्थ प्रिय होने की मान्यता, "कुत्ता काशी का कोतवाल है" जैसी लोकमान्यता, प्रत्येक वैष्णव के लिए तुलसी धारण अथवा तुलसी पूजन की अनिवार्यता तथा केवल नौ ग्रहों की शास्त्रीय मान्यता जैसे विषय शामिल हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि सभी विषयों पर विभिन्न परंपराओं के मतों का निष्पक्ष अध्ययन कर प्रमाण सहित समाज के समक्ष रखा जाएगा। बीएचयू के प्रोफेसर बोले- समाज के भ्रम को किया जायेगा दूर वक्ताओं ने कहा कि अभियान के अंतर्गत पुस्तिकाओं का प्रकाशन, शोधपत्र, व्याख्यान, जनसंवाद और सार्वजनिक चर्चाओं का आयोजन किया जाएगा, ताकि धार्मिक विषयों पर प्रमाण-आधारित विमर्श को बढ़ावा मिल सके। उनका कहना था कि सनातन परंपरा का मूल आधार ज्ञान, विवेक, संयम और शास्त्र हैं तथा समाज सुधार का मार्ग भी इन्हीं सिद्धांतों से प्रशस्त होता है।